Youthon

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Sunday, December 12, 2010

"A Good Morning Cup of Smile In The Midnight"---
                                               A Poem By Devesh Jha


A good morning cup of smile in the midnight......
A fragnance of you, in the dancing dew...
As your image looks in my hue,
Feel the wind of love's que,
 
Touch my lips as flame touch to light,
A Good Morning cup of smile in the midnight.
 
Hotchpotch of my heatrbeats,
Always snuggle for your kiss,
Then whisperse I miss, I miss,
O! Miss Kiss of Angel, is on my lips..
 
Rider of fate, don't wait for flight,
A good morning cup of smile in the midnight..


Keep your eye into my close,
Then listen to the air of my nose,
O! Mild anther of a rose,
Don't annoy for my beloved...
 
She is best blossoms of nature's almight,
A good morning cup of smile in the midnight..
 
In the wave of sea, see, meech,
When slowly sit she, me, bessech..
The divine of glee, lee, witch..
The magic we hug to other each...
 
Our love pride more than mountain height..
A good morning cup of smile in the midnight...
 
Dance your eyelid with my liplocks,
Do fast we have to walk more than clocks,
My Angel, I am ready to life's each socks,
Hold me tighly, I can face adversity of lots...


Without you I am the rainbow as black and white,
A good morning cup of smile in the midnight...
 
Welcome in my imagination, take my happiness,
Its the God bless, you are my Zest, You are my busy and rest,
Angel kiss the word "Devesh",
Or cut it keep on your name and pest..
As my breaths, always cross from your grace,...

You are in my eye, only you yonder in all sight,
A good morning cup of smile in the midnight.

Devesh Jha

Wednesday, December 8, 2010

love verse..


सुबह  को छूती  पहली  किरण  हो  तुम,
हँसते  लबो  में  छुपी  गम  हो  तुम,
ख्वाहिशों  को  समेट नज़रों  में ,
मंजिल  कि  ओर  बढती  कदम  हो  तुम.
ये  फूलों  कि  राहें  काँटों  में  खो  गए.
तस्वीर  तुम्हारी इन्ही वादियों  में  छोड़ गए.
अब  आँचल  को  मुखरे  पर  टिका  दो,
मेरे  जीवन  के  पायल  कि  छन - छन  हो  तुम,,,,,,
देवेश झा

Tuesday, December 7, 2010

बचपन जब प्यार हुआ था....

बचपन जब प्यार हुआ था....
                            
मत जलाओ आँखों की जुगनू को रात भर कि,
आँसू  बनके  भाप  सांसों  में  घुल जायेगा.
गिर पड़े हैं तेरे क़दमों के निशाँ पर,
के लहू हमारी तेरे धूल से धुल जायेगा.. 
हम किताबों के पन्ने में कुछ लिखा करते थे,
फिर रात भर तकिये तले उसे दबा रखते थे..
अब ना लिखों कुछ अपने होठों पर,
कि दब के कलम तेरे होठों से मचल जायेगा,
जाने क्या हम छुप छुपे के देखा करते थे..
तब कि नादानी में भला क्या अकल आएगा,
अट्ठन्नी को निचे गिरा तेरे जुल्फों पे झुका करते थे.
अब शायद ही तुम चूरन कि पुडिया लाती होगी,
फिर दोस्तों से छुपा मेरे किताबों में छुपाती होगी..
अब तो आधी छुट्टी का इंतज़ार ना होता होगा,
कि जब हम अपने बस्तें खिड़की से फेंक भागा करते थे,
वो बेचारा टूटा पीपल भी रोता होगा,
जहाँ तेरी चूरन के बदले हम चुम्बन दिया करते थे..
देवेश झा

Sunday, December 5, 2010

Drowsy Yawn...

         
उन्ही को खबर नहीं,
उनके आँसू  से  ही अपनी आँख धोयी है..
सारी रात सिरहाने में था,
सपना बनके सोया मैं,
उन्हें इस की खबर नहीं,
वो तो चला आया मैं आधी रात में,
जानने बाद की वो किसी और के लिए रोई हैं.
चाहत थी मेरी,
किसी और की वफ़ा बन गए,
बीमारी थी मेरी,
किसी और की दवा बन गए.
सजदा थी मेरी,
किसी और की दुआ बन गए.
मेरी ही छुपी जुर्म,
मुझी को सजा बन गए,
चल हुआ ये गीत पुराना सा,
हमने तो कुछ पागलपन की है,
पहले तो सपने में जाता था,
आज कल हमने खुदको उनके ही घर में बंद की है.
हाँ मैं लटकता तस्वीर हूँ,
जिसे हर साल वो फूल चढ़ाती है,
फिर अपने प्यार की मौत
के आँसू सभी को दिखाती हैं,
पागल लोग तो चले जाते हैं,
मैं तो दिवार पर ही लटकता हूँ,
फिर से मरने का जी करता,
जब अपने कातिल संग तुझे,
इसी घर में लेटे देखता हूँ..
 देवेश झा

Tuesday, November 30, 2010

muskurahat ki aahat

आहिस्ता हँस दे तू ज़रा,
मुस्कराहट की आहट लत बना दे,
दूर से ही जुल्फें तू उड़ा,
धड़कन की कम्पन मुझे बना ले.
आस पास की सर्द हवा,
ठहर तू इधर उसकी लट बना दे..
कानों में उसके जाकर तू कहना,
उसे है तेरे संग रहना..
अब तो ज़ुल्फ़ की लट संवारेगी,
अपने लाल चादर में आ,
मुझे धुंध में पुकारेगी...
ऊँगली अपनी मेरे लबों पे रखेगी,
फिर जाने से पहले रो देगी,
कुछ तो बहाना होगा,
लाल चादर को जलाना होगा,
जब ठण्ड से कांपेगी,
तभी  तो मेरे सीने से चिपक खुदको धाँपेगी,
कसकर उसके बाजुओं में,
मैं भी आना चाहूँगा,
लेकिन मेरा तो शरीर नहीं,
बस बन हवा उसके बाजुओं से गुज़र जाऊँगा..
देवेश झा

Monday, November 29, 2010

मैं गया एक दिन बादलों के पीछे,
जहाँ मुझे मेरी मरी प्रेमिका मिली,
मैंने पूछा गयी थी क्या करने कार के नीचे,
जो तुझे बेदर्दी से किसी ने कुचली..
वो रूठ कर भागने लगी, मैंने कलाई पकड़ा,
तब उसने सच्चाई बताई थोडा थोडा..
उसने कहा, एक दिन मैं कही थी
तुझे बुलाने पर पर "आई देवेश",
यमराज घूम रहा था बदलकर भेष,
उसने आज इंग्लिश समझा,
"आई देवेश" का मतलब "मैं देवेश" समझा..
उसने तेरी मौत के बदले मेरी जान ले बैठा,
अपनी गलती पर वो पछताया,
मेरी जान लौटा, तेरी जान लेने की बात बताया..
मैंने  झूठ बोला मैं देवेश ही हूँ,
कम से कम तेरे मौत को तो मैं जी रही हूँ..
हाँ ये बात किसीको मत बताना,
क्यूँकि तेरे आँखों में रहता है मेरा आना जाना.
देवेश झा

Gangajal jaisi...

 


लबों की शादी...

मेरे आँखों में अपने आँसू गिरा दे,
बारिश की बूंदे जैसे गंगाजल छूती.
थकी पलकें मेरे पलकों पे लिटा दे,
उजली  चाँद जैसे नीली आसमां में सोती..
ज़रा ज़रा मुस्कुरा की गगन हाथों में आ जाए,
बाँध मुट्ठी फिर सितारों से तेरी मांग भरा जाए.. 
घर का ठिकाना मैं ओस से पूछ तो लूं,
उसने कहा तूने नहीं आज गुल चूमा है..
ठहरा ले उसे होठों पर, के मुझे उससे डर है,
बन जाए ना ओस आँसू जो गिरता इधर उधर है..
काश के मैं तेरा होठ बन जाऊं,
फिर फूलों से ओस चुन लाऊं,
कभी तो तुम अपने लब को लबों से मिलाओगी,
अपने ऊपर के लब को पिया बना,
खुद भी नीचे की लब बन जाओगी..
दबी साँसों की बारात होगी,
एक लब दूल्हा मैं एक लब दुल्हन तू,
दो लबों के लिए तो हर शब्द मिलन की रात होगी..
अब दो लबों में बिना कुछ कहे भी बहुत बात होगी..
देवेश झा